देवगढ़ वन परिक्षेत्र में अवैध कटाई जारी, सुरक्षा व्यवस्था पर भारी पड़ रही तस्करों की कुल्हाड़ी कोरिया वन मंडल अंतर्गत देवगढ़ वन परिक्षेत्र के कैलासपुर बिट का मामला

kamrun nisha

देवगढ़ वन परिक्षेत्र में अवैध कटाई जारी, सुरक्षा व्यवस्था पर भारी पड़ रही तस्करों की कुल्हाड़ी

एक पेड़ मां के नाम” अभियान के बीच पुराने वृक्षों पर तस्करों की नजर, क्या वन अमला बना मूकदर्शक?

कोरिया वन मंडल अंतर्गत देवगढ़ वन परिक्षेत्र के कैलासपुर बिट का मामला

कोरिया वन मंडल की डीएफओ ने भी एक पेड़ माँ के नाम लगा कर पर्यावरण क़ा संदेश दिया

क्या अपने अधीनस्थ रेंजर को वन सुरक्षा क़ा पाठ पढ़ाने में कोई कमी छोड़ दी गई?

कोरिया वनमंडल के देवगढ़ वन परिक्षेत्र अंतर्गत कैलासपुर बिट में कथित रूप से अवैध कटाई का खेल लगातार जारी है। जंगल के भीतर से सामने आ रही तस्वीरें और स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवाल वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहे हैं। आरोप है कि वन तस्कर बेखौफ होकर लिपटस के बड़े-बड़े और वर्षों पुराने वृक्षों की कटाई कर रहे हैं, जबकि जंगलों की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाला वन अमला प्रभावी कार्रवाई करता नजर नहीं आ रहा।
एक ओर शासन-प्रशासन पर्यावरण संरक्षण के नाम पर “एक पेड़ मां के नाम” जैसे अभियान चलाकर करोड़ों लोगों को वृक्षारोपण के लिए प्रेरित कर रहा है, वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक रूप से खड़े वर्षों पुराने वृक्ष तस्करों की कुल्हाड़ी का शिकार हो रहे हैं। सवाल यह है कि जब पुराने वृक्षों की सुरक्षा ही सुनिश्चित नहीं हो पा रही, तब पर्यावरण संरक्षण के दावे कितने प्रभावी साबित हो रहे हैं?
अवैध कटाई स्थल पर पड़ी शराब की खाली बोतलों को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जंगल के भीतर तस्करों का आना-जाना लगातार बना हुआ है। स्थानीय लोगों का कहना है कि तस्कर बेधड़क तरीके से जंगल में पहुंचते हैं, वहीं बैठकर शराबखोरी और पार्टी करते हैं तथा आराम से बड़े-बड़े लिपटस वृक्षों की कटाई को अंजाम देते हैं। कटाई के बाद लकड़ियों को तत्काल बाहर निकालने के बजाय जंगल में ही छोड़ दिया जाता है और बाद में धीरे-धीरे उन्हें ठिकाने लगाया जाता होगा।
सबसे बड़ा सवाल वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर उठ रहा है। यदि वन क्षेत्र का नियमित निरीक्षण और गश्त होती, तो जंगल के भीतर बड़ी मात्रा में कटी हुई लकड़ियां लावारिस हालत में पड़ी नहीं मिलतीं। स्वाभाविक रूप से यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर इन लकड़ियों की जानकारी वन विभाग को क्यों नहीं लगी? यदि जानकारी थी तो उन्हें विभागीय कब्जे में क्यों नहीं लिया गया? और यदि जानकारी नहीं थी, तो निरीक्षण व्यवस्था की वास्तविक स्थिति क्या है?
क्षेत्र में चर्चा है कि शायद जिम्मेदार वन कर्मी और अधिकारी सुरक्षा की दृष्टि से जंगल का लगातार निरीक्षण करना जरूरी नहीं समझते, अन्यथा कटी हुई लकड़ियां जंगल में खुलेआम पड़ी नहीं होतीं। ऐसे में वन सुरक्षा व्यवस्था और निरीक्षण तंत्र दोनों पर सवाल उठना लाजिमी है।
वनों की सुरक्षा, संरक्षण, गश्त, चौकी व्यवस्था और निगरानी तंत्र पर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। इसके बावजूद यदि तस्कर जंगल के भीतर पहुंचकर वृक्षों की कटाई कर रहे हैं और लकड़ियां लंबे समय तक जंगल में पड़ी रह रही हैं, तो यह स्थिति वन सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। कहीं न कहीं ऐसा प्रतीत होता है कि वन संपदा की सुरक्षा में जिम्मेदार तंत्र के भीतर ही सेंध लग रही है।
अब देखना यह होगा कि देवगढ़ वन परिक्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारी इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं। क्या अवैध कटाई की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी, या फिर जंगलों की हरियाली तस्करों की कुल्हाड़ी के सामने यूं ही दम तोड़ती रहेगी?

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